Saturday, 22 August 2015

पराग मासिक पत्रिका-अंक 193-मई 1974



आज देश दीपक भाई (देहरादून) का जन्मदिन हैं, वे पिछले कई महीनों से पराग पत्रिका के पुराने अंक की स्कैनिंग चाह रहे थे, तो इससे बढ़िया मौका और क्या होता। 

सबसे पहले तो जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायेँ मेरी और सभी मित्रों की और से 


आज के दिन इस ४२ वर्ष पुराने अंक का लुत्फ़ उठाईये, साथ ही आपके चाहे गए श्री अवतार सिंह जी का एक लेख भी हैं, सो मज़ा दोगुना।


  • पराग मासिक पत्रिका  
  • अंक : 193   
  • पेज : 52  
  • भाषा: हिंदी
  • प्रकाशक: रमेशचन्द्र जी, द्वारा नेशनल प्रिंटिंग प्रेस, १० दरियागंज, दिल्ली-6
  • सम्पादक : कन्हैयालाल  नंदन जी
  • प्रकाशन वर्ष: मई 1974  

 डाउनलोड लिंक: 30 mb

हार्डकॉपी : सागर राणा भाई, नेपाल
स्कैन : शिवकुमार वैष्णव


( The Links of Magazine/Comics Given here are only for the purpose of preserving them in Electronic Format, not for the purpose of earning money through it. If someone having problem from these links/Magazines inform me/us.)

9 comments:

  1. धन्यवाद शिव भाई, इस इतने पुराने पराग पत्रिका के इतने शानदार एडिटिंग करके अपलोड करने के लिए | बचपन के मेरे प्रिय पत्रिका 'पराग' को देखकर उसे डाउनलोड करके पढ़ा | सबसे पहले खलीफा तरबूजी जो की 'स' को 'फ उच्चारण करते हैं, को पड़गा | छोटू लम्बू , बिल्लू का तो जबाब ही नहीं |एक बार फिर से धन्यवाद |

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद ।अब तो पराग कही भी पोस्ट नही हो रही।आपका यह कदम दिल खुश करने वाला है

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  3. खोयी हुई यादें |शतश: धन्यवाद् |

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  4. This comment has been removed by the author.

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  5. पहले मराठी भाषा में "किशोर" नामकी एक पक्षिक (Twice in a month) पत्रिका प्रसिद्ध होती थी| उसका गठन और रचना भी "पराग" जैसी ह़ी होती थी | दुर्भाग्य से "किशोर" की डिजिटल कापियां कही पर भी uploaded नहीं है| अगर किसी के पास हों तो कृपया शेयर करें|

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  6. dear shiv n sagar ji
    thank you for yr efforts. pl keep on uploading these rare issues.
    pl see if you hv old copies of deewana mag i request to upload this mag also.

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  7. Shiv aur Sagar Ji aapke madhyam se Parag ki ye pratiyan uplabdh ho payi jo durlabh thi. Main Parag Patrika ka purana pathak raha hu lekin niyamit roop se nahi padh pata tha, kyuki patrikayen apni pocket money se hi kharidni padti thi jo us zamane mein bahut kam thi. Apke saujanya se aur pratiya padhne ko mil jaye to bahut kripa hogi.1988 se le kar 1991 ke bich ki jo bhi pratiya mujhe mil payi thi wo bahut rochak thi ,lekin sabhi issues nahi padh paya...aap ki sahayta se agar wo padhne ko mil jaye to kya baat ho ....Dhanyawad.

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